29 लोगों को लेकर 9 दिनों से गायब है प्लेन, खौफनाक थे नीचे गिरने के वे आखिरी 26 मिनट

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चेन्नई/नई दिल्ली.चेन्नई के तम्बरम एयरबेस का एयर ट्रैफिक कंट्रोल (एटीसी) रूम। 22 जुलाई की सुबह 8.45 बजे तक सब शांत था। अभी 15 मिनट पहले 8.30 बजे ही तो सब फ्री हुए थे, जब एयरफोर्स के एएन-32 प्लेन ने भारी-भरकम लोड व 29 लोगों के साथ पोर्ट ब्लेयर के लिए उड़ान भरी थी। लेकिन अगले ही मिनट (8.46 बजे) रूम में हलचल बढ़ गई। और यही से शुरू हुई खौफ की दास्तां। चेन्नई के एटीसी रूम में मौजूद एक अफसर ने नाम न छापने की शर्त पर भास्कर को घटना वाले दिन का हाल बताया। 23 हजार फीट ऊंचाई से अचानक नीचे गिरता दिखा फिर अचानक गायब हुआ प्लेन…

– एएन-32 प्लेन के पायलट ने एटीसी से कॉन्टैक्ट कर कहा- मौसम खराब है, रास्ता बदलना है। एटीसी ने ओके किया। और इससे पहले कि कुछ और निर्देश दिए जाते प्लेन से कॉन्टैक्ट टूट गया।
– हालांकि प्लेन राडार पर दिख रहा था। वह 23 हजार फीट की ऊंचाई पर 272 किलोमीटर की दूरी पर था। कॉन्टैक्ट की कोशिश की जाने लगी।
– सबकी नजरें राडार स्क्रीन पर थी, तभी 9.12 बजे राडार पर प्लेन सीधे नीचे (फ्रीफॉल) गिरता दिखा। अगले ही पल वह स्क्रीन से गायब हो गया।
– रूम में सन्नाटा छा गया। और सबके चेहरे पर खौफ साफ दिख रहा था।
– अब यही उम्मीद बची थी कि प्लेन 11.30 बजे पोर्ट ब्लेयर सही सलामत उतरेगा। लेकिन ऐसा हुआ नहीं।
अब तक नहीं मिला है कोई सुराग
– 22 जुलाई से गायब प्लेन का अबतक कोई सुराग नहीं मिला है कि वह कहां है? खोज का दायरा 3.7 लाख वर्ग किलोमीटर है। समुद्र की 3.50 किमी गहराई तक इसे ढूंढ़ा जा रहा है।
– जैसे-जैसे वक्त बीत रहा है, सर्च ऑपरेशन मुश्किल होता जा रहा है। बीच में एक दिन सैटेलाइट ने कुछ इमेज दिखाई तो उम्मीद बंधी, लेकिन वे लकड़ी का कुंदे और मछुआरों की नाव के पार्ट्स निकले।
राडार से गायब होते ही अगर रेस्क्यू ऑपरेशन होता शुरू तो मिल जाता प्लेन
– पोर्ट ब्लेयर एटीसी रूम के एक सीनियर अफसर ने बताया कि प्लेन नहीं आया तो पोर्ट ब्लेयर के एटीसी ने ब्लाइंड ट्रांसमिशन कॉलिंग की। कोई जवाबी सिंग्नल नहीं मिला।
– इसके बाद अलर्ट जारी हुआ और सर्च और रेस्क्यू ऑपरेशन लॉन्च हुआ। राडार पर गिरते दिखने के दो घंटे बाद।
– यदि राडार से गायब होते ही अगर रेस्क्यू ऑपरेशन शुरू होता तो प्लेन के पता लगाने की संभावनाएं ज्यादा रहती है।
समुद्र में गिरने की संभावना ज्यादा
– बंगाल की खाड़ी और अंडमान-निकोबार आइलैंड पर करीब आठ महीने बारिश का मौसम रहता है। ऊंची लहरें, तेज हवा और मौसम खराब रहता है।
– प्लेन के गायब होने से ठीक पहले जो सिग्नल मिले, उससे एक्सपर्ट्स को यही लग रहा है कि प्लेन समुद्र में गिरा है।
– विमान में खराबी या इमरजेंसी में पायलट तुरंत एटीसी से रेडियो कॉन्टैक्ट कर सकता था।
– प्लेन की रैम्प डोर खोलकर लाइफ जैकेट के साथ क्रू मेंबर व साथ चल रहे लोग कूद सकते थे। इसका कोई सिग्नल तक नहीं मिला।
– ये सब कुछ चंद मिनट में ही हुआ। क्योंकि प्लेन भारी सामान से लदा है, इसलिए इसके समुद्र की गहराई में जाने की संभावना ज्यादा है।
बिना राडार सिक्युरिटी का था 800 किमी सफर
– चेन्नई से पोर्ट ब्लेअर की दूरी 1375 किमी है। प्लेन इसे करीब साढ़े तीन घंटे में पूरी करता है।
– प्लेन के उड़ते ही चेन्नई एटीसी तुरंत पोर्ट ब्लेअर एटीसी को सूचना देता है कि प्लेन कब उड़ा और कब पहुंचेगा।
– चेन्नई एटीसी को लगा राडार विमान को 300 किमी तक कंट्रोल करता है। इसके बाद 800 किलोमीटर का खतरनाक सफर है जो बिना राडार कंट्रोल के सिर्फ डायरेक्शन इंडिटेकर के भरोसे होता।
– जब दूरी 275 किलोमीटर रह जाती है तो विमान पोर्ट ब्लेअर एटीसी व राडार के कॉन्टैक्ट में आता है। फिर यही से कंट्रोलिंग होती है।
इमरजेंसी के 3 सिग्नल, एक भी नहीं मिले
#1. प्लेन का लोकेटर ट्रांसमीटर
– प्लेन में इमरजेंसी लोकेटर ट्रांसमीटर नहीं दबा। इस बटन से सिग्नल सीधे इसरो के सैटेलाइट को मिलते हैं। इससे प्लेन का सही एरिया और लोकेशन पता चलती है।
#2. प्लेन से मिलने वाले डिस्ट्रेस फ्रिक्वेंसी सिग्नल
– इमरजेंसी में प्लेन से डिस्ट्रेस फ्रिक्वेंसी सिग्नल निकलते हैं। ये आसपास के शिप, एयरक्राफ्ट, सैटेलाइट को मिलते हैं। विमान को आसानी से ट्रेस किया जा सकता है।
#3. प्लेन का ब्लैक बॉक्स
– प्लेन का क्रेश डाटा रिकॉर्डर यानी ब्लैक बॉक्स अभी तक नहीं मिला। क्रेश के बाद इससे तुरंत सिग्नल निकलते हैं, जिससे सर्च और रेस्क्यू में आसानी होती है।
(इनपुट: एयर मार्शल, (रिटायर्ड) पीएस अहलूवालिया ने तकनीकी पहलुओं को समझाया।)

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